धर्म से कमाई या कमाई का धर्म?

बात चल रही थी कि फलाने मंदिर में लोग ६-७ घंटे भगवान के दर्शन [दर्शन क्या.. एक झलक ही समझ लीजिये] के लिए पंक्तियों में खड़े रहते हैं.. फिर ऊपर से खूब चढ़ावा भी होता है..
सुना था मंदिर वो जगह है जहाँ पूरे दिन का थका हुआ आदमी जाता है तो थकान मिट जाती है.. तन की भी नहीं पर मन की भी..
पर इसे क्या कहा जाएगा जिसमें लोग मन से तो पहले से ही थके हुए हैं और धर्म के लुटेरे उनके तन की शक्ति भी क्षीण करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं..
मंदिर/मस्जिद/गिरजाघर/गुरुद्वारा/इत्यादि सब रूपए कमाने के साधन हो गए है..
बड़ी बेगैरत बात है कि जिसकी धुन में इंसान खोने की बात करता था, उसके नाम मात्र पर खुद ही करोड़ों रूपए भुन रहा है..

आज इंसान मंदिर शांति के लिए नहीं जाता है.. बस समाज के कुछ रीति-रिवाज़ मन पे बोझ बनाए हुए चला जाता है..
मैं मंदिर हर दिन नहीं जाता हूँ.. शास्त्र यह नहीं कहते की भगवान ने कहा है – मेरी इबादत हर दिन मंदिर जा कर करो.. इबादत तो तुम तब भी करोगे जब तुम अपने काम में मुझे ढूँढ लोगे..
भगवान को हमेशा याद रखने के लिए मंदिर में नहीं पर अपने मन में बसाना ज़रूरी है..

मैंने कई लोगों को जिनमें बहुत ज़िन्दगी में भी काफी करीब हैं देखा है,
हर दिन मंदिर जाते हैं सुबह-सुबह.. और दिन भर करोड़ों लोगों की बुराई करने में निकाल देते हैं..
हर मौसम की तीर्थ-यात्रा करते हैं और हर मौसम में अपने काले स्वभाव से करोड़ों लोगों से राड़ रखते हैं..
जोर-जोर से भगवान का भजन करते हैं और उतने ही जोर-जोर से अपने पड़ोसी से लड़ाई करने में पीछे नहीं रहते हैं…

सोचता हूँ की जो पुण्य वो सुबह-सुबह कमाते हैं.. दिन भर में खर्च कर देते हैं.. फिर ज़िन्दगी बैंक में क्या बचता हो जो स्वर्ग यात्रा में काम आये?
उनसे भले तो वो हैं जो भले ही हर रोज़ मंदिर न जाते हों पर लोगों की भलाई ज़रूर करते हैं..

सिर्फ मंदिर/मस्जिद का फेरा आपको ज़िन्दगी के फेरे से बाहर नहीं निकाल सकता..
आपका कर्म ही आपके कर्मठता का परिचय है..
आपका मन ही आपके मानवता का द्योता..
आपकी बोली ही आपकी बलवत्ता दर्शाता है और
आपकी दिनचर्या ही आपके दिन का अंत..

तो यह सीख उन लोगों के लिए जो भगवान को मंदिर और मस्जिद में देखते हैं..
“अल्लाह को मस्जिद, राम को मंदिर और ईसा को गिरजाघर में ढूँढना छोड़ दो.. बस यही कहूँगा..
एक दिन दिल से अपने दिल में झांकना, अगर वो न हुआ तो कहना.. मैं दुनिया छोड़ दूंगा.. “

मन की शान्ति अपने आप में ढूँढो क्योंकि दुनिया तो अशांत ही हो चला है..
पर सोचता हूँ अगर इसी तरह अगर हम धर्म के नाम पर लड़ते-कटते रहे तो इस दुनिया से शांत जगह भी कहीं न मिलेगी..

इस पोस्ट का गीत गुनगुनाइए : दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (किशोर कुमार)

तब तक के लिए..
खुदा हाफ़िज़..

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2 thoughts on “धर्म से कमाई या कमाई का धर्म?

  1. “आपका कर्म ही आपके कर्मठता का परिचय है..
    आपका मन ही आपके मानवता का द्योता..
    आपकी बोली ही आपकी बलवत्ता दर्शाता है और
    आपकी दिनचर्या ही आपके दिन का अंत.. “

    भाई, यह lines बहुत ही बेहतरीन लिखी हैं. जब तक इंसान इस बात को नहीं समझेगा, तब तक वह बुरे कर्म करेगा. और अपने इन बुरे कर्मों को cover up करने के लिए,अपने मन को झूठी तसल्ली देने के लिए व समाज में अपना नाम बढाने के लिए धर्म का सहारा लेगा.

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