रिसता यौवन

कब इस शांत-लहर-डर मन में उद्वेलित सुनामी जागेगी?इस घुटते मरते यौवन में कब चिंगारी सी भागेगी?काला अँधा सा ये जीवन, कैसा है यह बिका बिका?क्यों हर चेहरा मुरझाया सा, क्यों है हर तन थका थका?कब दौड़ेगी लाल लहू में, इक आग यूँ ही बैरागी सी?स्फूर्ति-समर्पण-सम्मान सघन सी, निश्छल यूँ अनुरागी सीकब इस शांत-लहर-डर मन में...आँखें … Continue reading रिसता यौवन

दो दिन ज़िन्दगी के

याद है वो कहावत, "चार दिन की है ये ज़िन्दगी.."? याद तो होगा ही, पर मुझे लगता है कि समय आ गया है इस कहावत को बदलने का। अब क्या कहें, समय और समाज में जो बदलाव आये हैं उसमें तो ये बदली हुई पंक्तियाँ ही सटीक लग रही हैं "दो दिन ज़िन्दगी के.."कितनी आसान … Continue reading दो दिन ज़िन्दगी के

खामोश राहें

कितनी खूबसूरत अनुभूति है ये खामोशी। दिन-ब-दिन बढ़ते शोरगुल और मचलती दुनिया में खामोशी अपना एक अलग स्थान रखती है। ये केवल मैं ही नहीं, दुनिया के तमाम लोग समझते होंगे जब अपने आसपास एक सन्नाटा पसर जाता है तो कैसे हम अपने में खो जाते हैं। जब कई दिनों तक ज़िन्दगी की उधेड़बुन में … Continue reading खामोश राहें

रिश्तों की डोर

रश्मि उन लाखों लड़कियों की तरह है जो आज बेबाक, आज़ाद और खुले माहौल में रहना पसंद करती हैं और रहती भी हैं। पहले पढ़ाई के लिए कई साल घर से दूर रही और उसके बाद से नौकरी करते हुए भी घर से दूर रहती है। रश्मि के मम्मी-पापा ने कभी उसके निर्णयों में हस्तक्षेप … Continue reading रिश्तों की डोर

बुरा तो मानो… होली है!

आजकल लोग बुरा नहीं मान रहे, क्या बात हो गयी है ऐसे? अभी कुछ दिन पहले तक तो लोग सुई गिरने पर भी हल्ला बोल मचा देते थे। अभी कल ही एक दोस्त मिला कई अरसे बाद। मैंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई कि अब शादी हो गई है तो मिलता नहीं है, जोरू का गुलाम … Continue reading बुरा तो मानो… होली है!

सफ़र वही, सोच नई

राजेश, यही नाम है उसका। वैसे तो कोई भी नाम ले लीजिये, कहानी कुछ ऐसी ही रहेगी।राजेश रोज़ मेट्रो में सफ़र करता है। वैसे देखें तो अंग्रेजी वाला suffer भी कहा जा सकता है। और सिर्फ राजेश ही क्यों, सिर्फ नाम बदल दीजिये और उसी की तरह कई और राजेश भी रोज़ मेट्रो में सफ़र … Continue reading सफ़र वही, सोच नई

बड़ा शहर vs अपना शहर

एक शहर है, बहुत विशाल, लोगों से भरा, लोगों से डरा, मकानों से पटा, सटा-सटा। ये शहर 'बड़ा शहर' है। एक है इसका उलट, छोटा सा, आधे घंटे में एक छोर से उस छोर, कम लोग, नीचे मकान, खाली सड़कें, बिलकुल विपरीत, 'छोटा शहर'।मस्त, अपना शहर vs व्यस्त बड़ा शहर (चित्र साभार गूगल)अभी मैं बड़े … Continue reading बड़ा शहर vs अपना शहर

सुनो, अरे सुनो!

साभार: गूगलराहुल मेरी-आपकी तरह एक आम आदमी, नौकरी करता है, घर आता है, घर चलाता है और फिर अगले दिन शुरू हो जाता है. अपने पितृगाँव से दूर है पर घर पर सब खुश हैं कि लड़का अपना अच्छा ओढ़-बिछा रहा है और घर की गाड़ी चला रहा है. अभी राहुल की शादी नहीं हुई … Continue reading सुनो, अरे सुनो!

आँखों देखी (फिल्म)

ऐसा कब होता है जब आप एक भ्रामक अवस्था में धकेले जाते हों और वहीँ पर रह जाना चाहते हो? मेरे साथ तो ये तब होता है जब मैं वो फिल्में देखता हूँ जो असलियत को आपके चेहरे पर दे मारती है। ऐसी फिल्में जो सिर्फ परदे पर एक बनावट है पर हज़ारों जिंदगियों की … Continue reading आँखों देखी (फिल्म)

गुल्लक: खुशियों का छोटा बक्सा

गुल्लक, एक ऐसा शब्द जो हमें अपने बचपन से जोड़ देता है। आज भी राह चलते किसी सड़क किनारे अगर मिट्टी के बिकते समानों में कहीं वो गोलगप्पम और ऊपर में टोपी की खूँटी लगा वो वस्तु दिख जाए तो अनायास ही मन में गुदगुदी दौड़ जाएगी और होंठों पे मुस्कान।गुल्लक:खुशियों का छोटा बक्सा (साभार: … Continue reading गुल्लक: खुशियों का छोटा बक्सा