घर की सैर

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रेल की सीटी ने कूच के आगाज़ को आवाज़ दे दी थी। एक गुब्बारा देखा था कई साल पहले जिसके पीछे बस्ती के कुछ बच्चे भागे जा रहे थे। मन उस गैस के गुब्बारे की तरह उड़ने लगा था। जाने क्यों घर जाते वक़्त मन का गुब्बारे की तरह उड़ना और उम्र के बीच कोई वास्ता नहीं होता।

होली का आना गर्मी का सूचक होता है पर ट्रेन के एसी डब्बे में सर्दी-गर्मी का फर्क मिट जाता है। कई साल पहले जब एसी में चढ़ना धन-शान की बात होती थी, तब हम गर्मियों में स्लीपर में चढ़ा करते थे। बिहार और यूपी में लू की मार खाते, उंघते-उन्घाते, धूल में सने हुए, फटे-हाल अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचते थे। रेल गाड़ी की आवाज़ हमने उन्हीं डब्बों में सुनी-सीखी थी। घर जाते वक़्त खाने का कोई हिसाब न होता था। हर छोटे-बड़े स्टेशन पर उतरते और वहाँ की नामचीन चीज़ खाते। अब रेलवे हमारी सेवा में हमेशा तत्पर रहता है। सोने को बिस्तर, खाने को गरमा गरम खाना, एसी इत्यादि सब जुटाता है। समय की दूरियां तो घट गयी है, पर लोगों की दूरियां?

ट्रेन में खाते पीते घर पहुंचे। घर पहुंचे तो देखा की माँ के हाथों का खाना बना है और उसमें एक अलग लज़ीज़पन टपक रहा था। समझ आया कि ट्रेन का खाना कारोबार के लिए बनता है, माँ का खाना प्यार के लिए। जमकर खाए और होली की तैय्यारियाँ शुरू हो गयी।

रात का मुहूर्त निकला है होलिका दहन का। हम गोबर की थेपड़ी से बने अलग अलग आकार के बड़कुलों को जला आये हैं। महंगी गाड़ियों में चलने वाला इंडिया इस परम्परा के खिलाफ है, प्रदुषण होता है। ११ नंबर की गाडी पर चलने वाले भारत को पता है फसल कटाई के समय निकले कीड़ों को ख़त्म करने का यह तरीका बहुत ही सरल और उम्दा है।

सुबह हो चुकी है। सड़के खाली हैं। घरों में बच्चे रात से ही गुब्बारे भरने में लगे हैं। सड़के खाली इसी लिए हैं। कौन सी दिशा से ये गुब्बारे सर पर गिरेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है, इसलिए लोग घरों में क़ैद हैं। पर जिनका दिल खुला आसमान है, वो क़ैद नहीं होते। वो घूम रहे हैं सड़कों पर, आवारा, मस्त हुए।
हम जानबूझकर घर पर देर तक सोते हैं। उठे हुए भी सोने का नाटक करते हैं। इतनी दूर आए हैं, माँ की डांट सुने बिना थोड़े न जाएँगे। पर माँ को बताते नहीं हैं कि जानबूझकर शरारत हो रही है। माँ गुस्सा होती है पर फिर उठकर आशीर्वाद ले लेते हैं, माँ खुश।

हम भी अपने बिल्डिंग की छत पर पड़ोसियों के साथ रंगोली ठिठोली कर रहे हैं। कुछ बच्चे शैतान हैं। पिचकारी से पीठ पर पानी की गोली दाग रहे हैं। अभी तक के सूखे त्वचा पर जब ज़रा सी भी फुहार पड़ती है तो अकड़न सी आ जाती है, गुदगुदी होने लगती है। हमारे हाथ रंगे हुए हैं। कई रंगों ने मिलकर नए रंग का रूप ले लिया है। होली का त्यौहार अगर भाभियों-सालियों के साथ न मने तो व्यर्थ है। पर अभी सिर्फ भाभियों के साथ ही खेल रहे हैं। भाभियाँ भी आज साड़ी का पल्लू कमर में खूंच कर आई हैं। षड़यंत्र रचा जा रहा है। पर षड्यंत्र भी किस काम का जब हम खुद ही रंगों के समंदर में कूदने को बेचैन हैं।
तभी ढोलक की ताल शुरू हो गयी है। अब सब रंग बरसे…, होरी खेले …, जैसे लोकप्रिय गानों को गा रहे हैं और नाच रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानों कई सालों का रंग आज सब पर भंग की तरह चढ़ रहा है। त्योहारों का मकसद पूरा होता दिख रहा है। गुरूजी की ठण्डाई और होली की मिठाइयों का दौर जारी है। पर ये मिठाइयों का स्वाद रंगों जैसा होने लगा है। रंगे हाथों से खाने का भी क्या मज़ा है। होली का आनंद शरीर का भीतरी भाग भी उठा रहा है!

सीढ़ियों पर रंगे हुए पैरों की गुलाबी छाप जगह जगह दिख रही है वो भी अलग अलग नापों के। छोटे छोटे हाथ दीवालों और सीढ़ी की रेलिंग पर साफ़ छप चुके हैं। दिवाली तक रंगों की ये निशानियाँ सुरक्षित हैं।

अब नहाकर पिछले ४ घंटे से चढ़ रहे रंग को मिटाने की जद्दोजहद होगी। रंग पूरी तरह नहीं छूटा है या यूँ कहें की उसकी कोशिश ही नहीं की है। आखिर ४ घंटे की मेहनत, अगले ४ दिन तक चेहरे पर साफ़ झलकनी चाहिए। किसी ने सुझाया है कि आज क्रिकेट खेलेंगे। सामने विशाल मैदान है। इतना बड़ा की शहर के १० स्कूल समा जाएँ। ३ दिन तक जमकर खेला। अब लड़खड़ाकर चल रहे हैं। शरीर के हर कोने में दर्द है। पर दिल में ज़रा भी नहीं। बचपन के दिन याद आ गए।

माँ पूछती है कि खाने में अगर कुछ “स्पेशल” बनवाना है तो बता दो। हम कहते हैं, “हमें सादी दाल-रोटी दे दो माँ, वही हमारे लिए स्वर्ग है।” माँ हंस पड़ती है। हम-सब कुछ गीत गुनगुनाने लगते हैं और गीतों का माहौल शुरू हो जाता है। हम सब संगीत से जुड़े हैं। २ घंटे यही सिलसिला चलता है। थकान ज़रा भी नहीं। संगीत से अलग उर्जा आ गयी है शरीर में।

वापसी का समय है। रेल सफ़र तो वैसा ही रहेगा। पहले माँ खाने के लिए पूड़ियाँ और आलू की सब्जी बनाती थी। रेलवे ने उस स्वाद पर भी पानी फेर दिया है। वापस निकल पड़े हैं बेहिसाब संघर्ष की ओर जहाँ लोग ज़िन्दगी काट रहे हैं। हम तो कुछ दिन, जी आये हैं ज़िन्दगी के। अब उस जीये हुए ज़िन्दगी की यादों के सहारे ही भावी ज़िन्दगी कटेगी। चश्मे के कोरों में जमे हुए गुलाबी रंग कई दिनों तक इस होली की याद दिलाएंगे। नाखूनों में जमे रंग, एक रंग भरे समय की ओर इशारा कर रहे हैं। अब माँ की डांट फोन पर सुनेंगे। भाभियों के साथ मटरगश्ती के लिए दिवाली का इंतज़ार रहेगा।

ये घर की सैर नहीं, ज़िन्दगी की सैर है।
ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी है…

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16 thoughts on “घर की सैर

  1. sundar holi sansmaran .badhai .बहुत प्यारी प्रस्तुति .भावात्मक अभिव्यक्ति ह्रदय को छू गयी आभार झुलसाई ज़िन्दगी ही तेजाब फैंककर ,. .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MANजाने संविधान में कैसे है संपत्ति का अधिकार-1

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  2. इस बेहतरीन पोस्ट को आपकी आवाज़ मे तो सुन कर बेहद अच्छा लगा। इस बहाने आपके रिकोर्डेड गानों तक भी पहुँच गया 🙂

    सादर

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