हाय री हिन्दी!

तो भईया, बात है हिन्दी की। कई लोगों का मानना है कि हिन्दी भाषा की तरफ लोगों का रुझान कम इसलिए भी हो रहा है क्योंकि हिन्दी भाषा से जुड़े रोज़गार के अवसर बहुत कम हैं और जो भाषा रोज़गार ना देती हों, उसे समझकर, पढ़कर, लिखकर, बोलकर भला क्या फ़ायदा होने वाला है?

बिलकुल सच बात है। अरे जब पेट भरने को पैसा होगा तभी तो आदमी भाषा और उसकी बारीकियों के बारे में सोचेगा, है कि नहीं?

“खाली पेट बस भोजन सूझे, पीछे करे तू काज दूजे”

आप में से जो मुझे काफी पहले से जानते हों या मेरे बारे में अंतरजाल द्वारा जानते हों, उनको मालूम होगा कि मैं अपनी खुद की एक हिन्दी गीत के बोलों (लिरिक्स) की वेबसाइट चलाता हूँ: Lyrics in Hindi – लफ़्ज़ों का खेल, और यह सिलसिला बादस्तूर ९ सालों से जारी है।

अब चूँकि मेरी वेबसाइट को इतने साल हो गए तो मैंने इस बार सोचा कि कुछ लेखकों को काम पर रखता हूँ जो कि गीत के बोल डालने में मेरी सहायता करेंगे और साथ ही साथ कुछ कमा भी लेंगे। मैंने कई फ्रीलान्स (स्वनौकर) वेबसाइट और अपनी वेबसाइट के फेसबुक पेज पर यह जानकारी डाली और लोगों के भर-भर के जवाब भी आने लगे कि हाँ वो ये कार्य करने के इच्छुक हैं।

मैं तो बेहद खुश हुआ कि इतने लोग ऐसे काम ढूँढ रहे हैं जो उनके लायक हो और हिन्दी में भी हो! मैंने कईयों को मेल इत्यादि भेजा और एक छोटी सी हिन्दी की परीक्षा ली जिसमें उन्हें भेजे गए ४-५ हिन्दी की पंक्तियों में त्रुटियाँ ठीक करके मुझे वापस भेजना था। बेहद ही सरल सा काम था।

आपको बता दूँ कि मेरे पास करीब ३० लोगों ने काम की इच्छा जताई जिसमें से सिर्फ ४-५ को ही मैं अभी शामिल कर पाया हूँ। २५ के करीब लोग तो ऐसे थे जो ४-५ पंक्तियों की गलतियों को भी ठीक करने में असक्षम हैं। अगर मैं इसी जानकारी को भारत के हिन्दी भाषी लोगों तक खींच दूँ तो कोई गुंजाइश नहीं रहेगी कि १०० में से ९० लोगों को हिन्दी ठीक से लिखनी तक नहीं आती। कैसी विडम्बना है कि एक तरफ हम हिन्दी के लिए लड़ने की कोशिश कर रहे हैं और दूसरी ओर हिन्दी भाषियों की ही बत्ती गुल है। और तो और, उन ४-५ लोगों में से भी कोई भी सटीक, शुद्ध हिन्दी नहीं जानता है और उन्हें कई बार मुझे सुधारना पड़ता है।

अगर हम किसी भी कार्य की गुणवत्ता बरकरार नहीं रखेंगे तो फिर ये रोना भी हमें बंद करना होगा कि उस कार्य के लिए ज़्यादा अवसर नहीं मिल रहे हैं। लोगों ने हिन्दी किताबें पढ़ना बंद कर दिया है और आज के समय में जो हिन्दी किताबें छप भी रही हैं, उनमें भी मैं कई सरल शब्दों में त्रुटियाँ अक्सर देखता हूँ। भाषा के प्रति अगर सच्चा लगाव हो तो अच्छी किताबें, जो कि सटीक संपादक द्वारा प्रेषित की गई हों, उन्हें पढ़ना और ‘ध्यान’ से पढ़ना ज़रूरी हो जाता है। अच्छा पढ़ना और फिर उतना ही अच्छा लिखने की कोशिश करना उतना ही आवश्यक है।

मैंने हिन्दी में ना ही बीए किया है, ना ही एमए, किन्तु माँ द्वारा बचपन में पढ़ाई और फिर खुद के निरिक्षण शक्ति के बल पर मैं आज कह सकता हूँ कि मेरी हिन्दी लेखन भारत के उन १०% लोगों में होगी जो कि लिखते वक़्त वर्तनियों में सबसे कम गलतियाँ करते हैं। मुझे आज भी याद है जब नौवीं कक्षा में हमारे हिन्दी के अध्यापक ने परीक्षा पन्ने बाँटते वक़्त कहा था कि ये जिसका भी पन्ना है, इसे पढ़कर बहुत अच्छा लगा क्योंकि पूरे १० पन्नों में सिर्फ १ वर्तनी की गलती थी वो भी ‘कि’ की जगह ‘की’ लिखा था। तबसे मैं उनका प्रिय छात्र हो गया था।

अगर आप और हम अंग्रेजी सुधारने के लिए इतनी कड़ी मेहनत करने को तैयार हैं तो अपनी मातृभाषा को भी थोड़ी सुधार लें? हिन्दी के अंक तो अब हर जगह से गायब होते जा रहे हैं। हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य पर सरकार ने जो बड़े-बड़े परदे छपवाए थे (जैसा की ऊपर की चित्र में है), उनमें भी अंक सारे अंग्रेजी में ही थे। कैसी विडम्बना है कि हिन्दी दिवस मनाते वक़्त भी वो अंग्रेजी अंकों (और शब्दों) का प्रयोग कर रहे थे।

खैर ये तो ऐसा खेल है जहाँ दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। अगर आप अच्छी हिन्दी लिखते/बोलते हैं तो आपको नए रोज़गार के अवसर मिलेंगे और अगर रोज़गार के अवसर मिलेंगे तो आप अच्छी हिन्दी लिखना/बोलना भी सीख जाएँगे। दोनों एक ही नाव के दो चप्पू हैं। दोनों साथ-साथ चली तो नाँव तेज़ी से बढ़ेगी अन्यथा धीमी गति से बढ़ते-बढ़ते विश्व के बाकी भाषाओं से बहुत पिछड़ जाएगी।

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