कब तक इस नकली हवा की पनाह में घुटोगे तुम? आओ, सरसराती हवा में सुरों को पकड़ो तुमसंगीत बन जाओ तुम!कब तक ट्रैफिक की ची-पों में झल्लाओगे तुम?आओ, उस सुदूर झील की लहरों को सुनो तुमसंगीत बन जाओ तुम!कब तक अपनी साँसों को रुपयों में बेचोगे तुम?आओ, आज़ाद साँसों की ख्वाहिश सुनो तुमसंगीत बन जाओ … Continue reading संगीत बन जाओ तुम!
ब्लॉगिंग के ५ साल
१६ अप्रैल २००८ को मैंने ज़िन्दगी में पहली बार ब्लॉग किया. आज उस लेख को ५ साल से ऊपर हो गए हैं. और ख़ुशी की बात यह है कि यह किसी पंचवर्षीय योजना के तहत ब्लॉगिंग की प्रथा नहीं रही है और फिर भी सफल रही है. हमारी सरकारों की तरह नहीं जो पंचवर्षीय योजनाएं … Continue reading ब्लॉगिंग के ५ साल
माँ का आँचल
ऑडियो यहाँ सुनें:https://www.reverbnation.com/widget_code/html_widget/artist_1159585?widget_id=50&pwc%5Bdesign%5D=default&pwc%5Bbackground_color%5D=%23333333&pwc%5Bincluded_songs%5D=0&pwc%5Bsong_ids%5D=16995355&pwc%5Bphoto%5D=0&pwc%5Bsize%5D=fitप्रशांत एक सुशिक्षित और भद्र इंसान था। घर से दूर रहते ५-६ साल हो गए थे। अब नौकरी कर रहा था ३ सालों से। उससे पहले पढाई। दिल का बड़ा सख्त था। साल में २-३ बार ही घर आ पाता। नौकरी पेशा आदमी की सांस और आस दोनों उसके मालिक के हाथ में होती है। … Continue reading माँ का आँचल
घर की सैर
ऑडियो यहाँ सुनें:https://www.reverbnation.com/widget_code/html_widget/artist_1159585?widget_id=50&posted_by=artist_1159585&pwc%5Bdesign%5D=default&pwc%5Bbackground_color%5D=%23333333&pwc%5Bincluded_songs%5D=0&pwc%5Bsong_ids%5D=16824428&pwc%5Bphoto%5D=0&pwc%5Bsize%5D=fitरेल की सीटी ने कूच के आगाज़ को आवाज़ दे दी थी। एक गुब्बारा देखा था कई साल पहले जिसके पीछे बस्ती के कुछ बच्चे भागे जा रहे थे। मन उस गैस के गुब्बारे की तरह उड़ने लगा था। जाने क्यों घर जाते वक़्त मन का गुब्बारे की तरह उड़ना और उम्र के बीच … Continue reading घर की सैर
उम्मीदें
काश ये ऐसा हो जाता, काश वो ऐसा हो जाये। पर ये, वो क्यों नहीं? पर वो, ये क्यों नहीं? सबके मन में एक तूफ़ान फड़कता रहता है कि जो वो चाहे वैसा हो। "उम्मीद" एक इतना सशक्त और दृढ़ शब्द है जिसके दम पर ये दुनिया टिकी हुई है। उठते ही दिन के अच्छे … Continue reading उम्मीदें
अंतरजाल का जाल
अंतरजाल, आज थोड़े से भी पढ़े लिखे लोगों के लिए उनके जीवन का अभिन्न अंग हो गया है और पढ़े-लिखे ही क्यों, अशिक्षित लोगों के लिए भी यह कोई माया से कम नहीं है जो अपने जादू से उनको मोह लेती है।कम्प्युटर का प्रचलन भारत में एक विस्तृत पैमाने पर करीब ८-१० साल पहले ही … Continue reading अंतरजाल का जाल
दिखावा और हम – कब बदलेंगे हम?
लो एक साल और निकल लिया सस्ते में और हमें तो माधुरी भी नहीं मिली रस्ते में..कई लोगों ने सरकार के खिलाफ विरोध में नए साल के जश्नों को एक तरफ कर दिया। काबिल-ए-तारीफ़ है उनका जज्बा और हक़ की लड़ाई। और वहीँ कितने ही लोगों ने हर साल की तरह दारु पी कर हुडदंग … Continue reading दिखावा और हम – कब बदलेंगे हम?
भौतिकवाद की दोस्ती
बात ज्यादा पुरानी नहीं है, या यूँ कहें की ज़हन में तरोताज़ा है।कॉलेज का प्रथम वर्ष समाप्ति पर था। कई नए दोस्त बने थे, उनमें से धीरज भी एक था।प्रथम सेमेस्टर की समाप्ति पर मैं घर से कीबोर्ड (पियानो) खरीद लाया था क्योंकि हारमोनियम के बाद अब यह सीखने की बड़ी इच्छा थी।एक दफे मैं और धीरज क्लास से … Continue reading भौतिकवाद की दोस्ती
अपने
सोचा करता था वह "अपने" लोगों के बारे मेंवही जिनको वो कई रिश्तों से पहचानता थामाँ, पिता, भाई, बहन, चाचा, दोस्त, जिगरी दोस्त, चड्डी दोस्त.."अपने"यह शब्द भेदती थी उसे कभी..क्या यह शब्द दुनिया का छलावा नहीं है?इस शब्द ने कईयों की दुनिया नहीं उजाड़ी है?परफ़िरक्या इन्हीं "अपनों" ने उसकी ये ज़िंदगी हसीन नहीं बनाई है?क्या … Continue reading अपने
सामंजस्य
यह आलेख जनसत्ता में ३ दिसम्बर को छपा था। इ-संस्कार यहाँ पढ़ें। "सामंजस्य" अर्थात 'तालमेल', एक ऐसा शब्द है जिसकी सही पहचान और सही परख हम-आप करने से चूके जा रहे हैं। यह एक ऐसा शब्द है जो इस श्रृष्टि के पूरे वजूद को अपने अंदर समेटे हुए है। पर इस भाग-दौड़ वाली ज़िन्दगी (ज़िन्दगी? … Continue reading सामंजस्य