यह लेख ६ अक्टूबर २०१२ को जनसत्ता में छपा था। ई-पेपर पढने के लिए यहाँ क्लिक करें। (संतोष त्रिवेदी जी का फिर से एक बार धन्यवाद!)"ज्ञानी", एक ऐसा शब्द है जिससे हम-आप खुद को पढ़े लिखे समझने वाले लोग समझते हैं कि अच्छी तरह से समझते हैं, भांपते हैं। पर क्या सच में आप इतने … Continue reading भ्रष्ट ज्ञान
संस्कार
रमेश बस स्टॉप पे खड़ा बस का इंतज़ार कर रहा था। दिन काफी व्यस्त रहा था ऑफिस में।स्टॉप से थोड़ा आगे बाईं ओर 2 मोहतरमाएं खड़ी थीं। एक के सलवार-दुपट्टे और एक के जींस-टॉप से समझ आ गया कि ये माँ-बेटी हैं और ज़रूर ही अपनी कार का इंतज़ार कर रही हैं। और दोनों के पहनावे से … Continue reading संस्कार
त्यौहार, मौज-मस्ती, ज़िन्दगी!
त्यौहारों का मौसम फिर से शुरू हो रहा है और हाँ छुट्टी का मौसम भी.. :)बारिश के अकाल की तरह छुट्टियों का यह अकाल हर नौकरी-पेशा इंसान को तंग करता है..अब त्यौहारों का मौसम भी एक ऐसे त्यौहार से जिसकी हमारी समाज में जड़ें बहुत गड़ी हुई हैं और जो समय के साथ-साथ अपने रंग … Continue reading त्यौहार, मौज-मस्ती, ज़िन्दगी!
बदलाव का समय
करीब करीब 2 महीने हो गए हैं पोस्ट किये हुए । पता नहीं कई विषय भी दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते रहे पर उंगल-दबाव-यंत्र (की-बोर्ड) के ज़रिये ब्लॉग पर नहीं चिपक पाए ।हर एक की ज़िन्दगी में समय-समय पर बदलाव आते रहते हैं और फिलहाल मैं भी कुछ ऐसे ही बदलाव के दौर के थपेड़ों को झेलता हुआ उस अंतिम लहर का इंतज़ार … Continue reading बदलाव का समय
जनसत्ता में आलेख
पहली बार "जनसत्ता" में आलेख छपा "समाज की गति" शीर्षक से |१४ मई २०१२ का अखबार देखिएगा | बड़ी ख़ुशी हुई |अब पहली बार इतने बड़े समाचार पत्रिका में आलेख छपे तो कितनी ख़ुशी होगी, इसका अंदाजा काफी लोगों को होगा | पर इससे ज्यादा ख़ुशी इस बात कि की संतोष त्रिवेदी जी ने कई महीनों … Continue reading जनसत्ता में आलेख
सामाजिक खेल
समाज, एक ऐसा शब्द जो दर-ब-दर हमारे आस पास घूमता है.. मंडराता है.. डराता है.. धमकाता है.. बांधे रखता है.. इस शब्द से रिश्ता ज़िन्दगी के पहले अक्षर से जुड़ जाता है.. हम क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, कैसे उठे-बैठते हैं, कैसे चलते हैं, क्या कार्य करते हैं, किससे मिलते हैं, कहाँ जाते हैं, … Continue reading सामाजिक खेल
सरल या क्लिष्ट हिन्दी
एक अविरल भिन्नता जिसपर छोटी से बहस और सोच..
मधुशाला की राह
नौकरी में रमे हुए राकेश को १ ही साल हुआ था.. अपने कॉलेज में सबसे अच्छे छात्रों में शुमार था और नौकरी में भी अव्वल..जब अंटे में दो पैसे आने लगे तो मनोरंजन के साधन बदलने लगे.. जहाँ एक ढाबा ही काफी हुआ करता था दोस्तों के साथ, आज बड़े-बड़े होटलों में जाता था..कभी दारु-सिगरेट … Continue reading मधुशाला की राह
"भाग डी.के.बोस" का सरल हिन्दी अनुवाद
यह लेख मैंने काफी पहले लिखा था पर पोस्ट नहीं किया था । पहले ही बता दूं कि गीत की गहराई को समझते हुए इसके विश्लेषण को आराम से पढ़ें । पोस्ट की लम्बाई पर मत जाओ, अपना समय लगाओ 🙂 Daddy मुझसे बोला, तू गलती है मेरी तुझपे जिंदगानी guilty है मेरी साबुन की … Continue reading "भाग डी.के.बोस" का सरल हिन्दी अनुवाद
प्यार में फर्क
दिवाली का दिन था और विशेष अपने कॉलेज से घर छुट्टी पर आया हुआ था.. ठण्ड भी बढ़ रही थी और इसलिए विशेष के पिताजी अपने लिए एक जैकेट ले कर आये थे... विशेष ने जैकेट देखा तो उसे खूब पसंद आया और वह बोल उठा - "वाह पापा! यह तो बहुत ही अच्छा जैकेट … Continue reading प्यार में फर्क